Sunday, November 8, 2009

" युवा कवियो " के प्रति निकानोर पारा की एक कविता

अनुनाद के सहलेखक पंकज चतुर्वेदी नए कवियों और पाठकों के मार्गदर्शन के लिए "दहलीज़" नामक एक स्तम्भ चला रहे हैं लेकिन इधर कुछ दीगर व्यस्तताओं के चलते उन्होंने इस स्तम्भ का काम फिलहाल स्थगित कर दिया है। इस कविता का अनुवाद मैंने उनके इसी स्तम्भ के लिए किया था। स्तम्भ उनका है इसलिए मैं ख़ुद-ब-ख़ुद इस कविता को "दहलीज़" के लेबल से नहीं छाप सकता। इसे स्तम्भ से बाहर यहाँ छाप रहा हूँ तो बस इस नीयत और शुभकामना के साथ कि पंकज भाई दुबारा अपनी उस दहलीज़ तक लौट आयें !
आइये मेरे साथ आप भी बोलिए आमीन और पढ़िये निकानोर पारा की यह अद्भुत छोटी कविता !

लिखो जैसा तुम चाहो
चाहे जिस भी तरह तुम लिखो !

बहुत -सा ख़ून बह चुका है पुल के नीचे से
इस बात पर यक़ीन करने में
कि बस एक ही राह है, जो सही है !

कविता में तुम्हें हर चीज़ का अख़्तियार है

लेकिन शर्त बस इतनी है
कि तुम्हें एक कोरे कागज़ को बेहतर बनाना है !
****

वह कहीं भी हो सकती है - आलोक श्रीवास्तव

आलोक श्रीवास्तव की इस कविता को दरअसल स्त्रियों पर लिखी गई आधुनिक कविता और स्त्री विमर्श का संक्षिप्त आलोचनात्मक काव्येतिहास भर माना जाए या इसके अलावा कविता का अपना एक अलग और प्रभावशाली अस्तित्व भी है, इस निर्णय को मैं पाठकों के विवेक पर छोड़ता हूं। कभी प्रकाशित कविता के बारे में प्रस्तोता का ज़रूरत से ज़्यादा दिया गया वक्तव्य उसके मूल आस्वाद या धार को बेमानी भी बना देता है, इसलिए आइये बिना वक्त बर्बाद किए पढ़े आलोक की यह कविता।


वह कहीं भी हो सकती है!

यह कहानी शुरू होती है
गुज़री सदी के आखिरी हिस्से से
जब निराला की प्रिया
किसी अतीत की वासिनी हो गई थी
और प्रसाद की नायिकाएं
अपनी उदात्तता, भव्यता, करुणा और विडंबना में
किसी सुदूर विगत और
किसी बहुत दूर के भविष्य का स्वप्न बन गई थीं

अब यहां थी
एक लड़की जिसके बारे में लिखा था रघुवीर सहाय ने
जीन्स पहनकर भी वह अपने ही वर्ग का लड़का बनेगी
या वह स्त्री जो अपनी गोद के बच्चे को संभालती
दिल्ली की बस में चढ़ने का संघर्ष कर रही थी
और सहाय जी के मन में
दूर तक कुछ घिसटता जाता था
वहां स्त्रियां थीं, जिनको किसी ने कभी
प्रेम में सहलाया न था
जिनके चेहरों में समाज की असली शक्ल दिखती थी...

उदास, धूसर कमरों में
अपने करुण वर्तमान में जीती
उत्तर भारत के निम्न मध्यवर्ग की वे स्त्रियां
कभी हमारी bahanein बन जातीं, कभी मॉंएं
कभी पड़ोस की जवान होती किशोरी
कभी कस्बे की वह लड़की
जो अपनी उम्र की तमाम लड़कियों से
कुछ अलग नज़र आती
इतनी अलग कि
किताबों में पढ़ी नायिकाओं की तरह
उसके साथ मनोजगत में ही कोई
भव्य, उदात्त, कोमल, पवित्र प्रेम घटित हो जाता...

फिर वह सदी भी गुज़र गई
निराला और प्रसाद तो दूर
लोग रघुवीर सहाय को भी भूल गए
और उन लड़कियों को भी जो
अभी-अभी गली-मुहल्ले के मकानों से कविता में आई थीं
फिर वे लड़कियां भी खुद को भूल गईं
और जैसे-तैसे चली आईं
महानगरों में....

एक संसार बदल रहा था
ठस नई बनती दुनिया में लड़कियों के हाथों में मोबाइल फोन थे
ब्हुराष्ट्रीय पूंजी की कृपा से ही क्यों न हो
आंखों में कुछ सपने भी थे
ये दो भारतों के बीच के तीसरे भारत की लड़कियां
ठस दुनिया को बेहतर जानती थीं

साहित्य-संस्कृति, कविता, विश्व-सिनेमा
फिर मॉल और मल्टीप्लैक्स की यह दुनिया
गद्गद् भावुकता और आत्मविभोर बौद्धिकता
और हिंदी की इस पिछड़ी पट्टी से आए
स्त्री-विमर्श रत खाए-अघाए कुछ कलावंत, कवि, साहित्यकार...

दो भारतों के बीच के इस तीसरे भारत की
इन लड़कियों के अलावा एक और दुनिया थी लड़कियों की
जो आलोकधन्वा की भागी हुई लड़कियों की तरह
न तो साम्राज्यवादी अर्थ-व्यवस्था की सुविधा से
अपने सामंती घरों से भाग पाईं
न ही टैंक जैसे बंद और मजबूत घरों के बाहर बहुत बदल पाईं

कवि का यूटोपिया पराजित हुआ.

यह तीन भारतों का संघर्ष है
स्त्रियां ही कैसे बचतीं इससे
वे तसलीमा का नाम लें या सिमोन द बोउवा का
उनकी आकांक्षाएं, उनके स्वप्न, उनका जीवन
उन्हें किसी ओर तो ले ही जाएगा
ठीक वैसे ही जैसे
माक्र्सवाद, क्रांति, परिवर्तन का रूपक रचते-रचते
पुरुषों का यह बौद्धिक समाज
व्यवस्था से संतुलन और तालमेल बिठा कर
बड़े कौशल से
अपनी मध्यवर्गीय क्षुद्रताओं का जीवन जीता है....

बेशक ये तफ़़सीलें हमारे समय की हैं
समय हमेशा ही कवियों के स्वप्न लोक को परास्त कर देता है
पर यदि हम अपने ही समय को निकष न मानें तो
कवियों के पराजित स्वप्न भी
अपनी राख से उठते हैं
और पंख फड़फड़ाते हुए
दूर के आसमानों की ओर निकल जाते हैं
फिर लौटने के लिए...

हो सकता है वनलता सेन अब भी नाटौर में हो....
या चेतना पारीक किसी ट्रॉम से चढ़ती-उतरती दिख जाए....

या फिर वह झारखंड से विदर्भ तक कहीं भी हो सकती है
कोई स्वप्न तलाशती
और खुद किसी का स्वप्न बनी!
***
01 नवंबर, 2009
___________________________________

आलोक श्रीवास्तव, ए-4, ईडन रोज, वृंदावन काम्पलेक्स, एवरशाइन सिटी, वसई रोड, पूर्व, पिन- 401 208 (जिला-ठाणे, वाया-मुंबई) फोन - 0250-2462469

Thursday, November 5, 2009

कुफ़्र-मार्टिन एस्पादा की एक कविता

बक ही दिया जाए कुफ़्र: कविता हमें बचा सकती है,
उस तरह नहीं जैसे कोई मछुआरा डूबते हुए तैराक को खींच लेता है
अपनी कश्ती में, उस तरह नहीं जैसे ईसा ने, चीखों-चिल्लाहटों के बीच,
पहाड़ी पर अपनी बगल में सलीब पर लटकाए गए चोर से
अमरत्व का वायदा किया था, फिर भी मुक्ति तो है ही.

जेल की लाइब्रेरी से ली गई कविता की पुस्तक पढ़ते हुए
कोई कैदी सुबकता है कहीं, और मैं जानता हूँ क्यों उसके हाथ
एहतियात बरतते हैं कि पुस्तक के जर्जर पन्ने टूट न जाएँ.
*****
(मार्टिन एस्पादा का परिचय और एक कविता अनुनाद की इस पुरानी पोस्ट पर मौजूद है)

Tuesday, November 3, 2009

रोना - हरि मृदुल की एक कविता

हेमंत स्मृति सम्मान तथा महाराष्ट्र साहित्य अकादमी के संत नामदेव पुरस्कार से सम्मानित युवा कवि हरि मृदुल की यह कविता संवाद प्रकाशन वाले भाई श्री आलोक श्रीवास्तव ने उपलब्ध कराई है। उनके प्रति आभार। इस श्रृंखला की पिछली दो कविताएँ यहाँ और यहाँ पढ़ी जा सकती हैं।


आखिर ऐसी बात कौन सी
भर आए आंखों में डबडब आंसू

पोंछते ही इनके फिर भर आने में संदेह
इसलिए पोंछने की होती नहीं इच्छा

सूख रहे आंखों में ही अब
बस कोरों पर ही थोड़े बचे हुए हैं

शीशे के सम्मुख खड़े हो लिए
ऐसे दृश्य देखने के भी हम उत्सुक।
***
(यह कविता `सफेदी में छुपा काला´ संग्रह में मौजूद है, जिसे, 2007 में उद्भावना ने प्रकाशित किया।)

Saturday, October 31, 2009

काव्य-कथा : बोरहेस और हिमालयाः टुनाईट आयम नॉट ए मंक / गिरिराज किराड़ू


(पिछले दिनों मैंने देखा ऑल जस्टीफाईड छपी हुई, ‘गद्य’ ‘दिखती’ हुई कवितायें वेब पर प्रकाशित होने पर कुछ लोगों को लगा यह कोई ‘नयी’ तरह की कविता या उसकी फैशन है। विश्व कविता में तो यह बहुत पुरानी चीज़ है ही, हिन्दी में भी दशकों पुरानी है। खुद मेरा फॉर्म एकदम शुरू से, मुख्यतः, यही रहा है लेकिन अपने लिखे हुए कुछ पाठ ऐसे हैं जिन्हें कविता की जगह ‘काव्य-कथा’ (वर्स नैरेटिव) कहना मुझे अधिक ठीक लगता है। यह नवीनतम काव्य-कथा है, दस दिन पुरानी – कवि।)

काव्य-कथा



रोसा बोराखा जो कभी बुरा नहीं मानती जब अंग्रेजी स्पेलिंग के अनुसार रोसा बोराजा कह कर बुलाता हूँ, वह तब भी बहुत कम बुरा मानती है जब लोग उसे साईकिल पर भटकने वाली अंगरेजण कहते हैं जबकि वो स्पेनिश, माफ़ करें स्पहानी, है और भारत को कुछ यूँ जानने लगी है कि शिवसेना सुनकर कहती है ओह वो जो बीजेपी से भी खराब है, जो हायजीन की ऐसी-तैसी करते हुए हर उस ढाबे पर चाय पीती है जिसके नीचे से मलमूत्र वाली नाली बहती है या उस गंगा में डुबकी लगा लेती है जो खुद बड़ा-सा नाला हो गई है उसके प्यारे बनारस में वही रोसा बोराजा जिसने पाँच बरस अंग्रेजी और दो बरस स्पहानी की पढ़ाई की है और इतने बरस से भारत में स्पहानी पढ़ाकर बोर हो गई है – जो इस बात से नाराज जरूर होती है कि हिन्दी अखबारों में छपने वाले फोन सेक्स के विज्ञापनों में भारतीय अपनी तस्वीरें क्यों नहीं छापते? उसे हिन्दी फिल्मों की कैबरे क्वीन हेलेन की कहानी उतना ही उदास करती है जितनी जनरल फ्रांको की रेज़ीम. उसी, उसी रोसा बोराजा के साथ एक सौ पचास किलोमीटर का सफर टैक्सी में करते हुए, मन ही मन यह प्रार्थना करते हुए उसे भनक न पड़े जिस ड्राईवर को वह बईया कह कर बुला रही है उसके बारे क्या में बक-सोच रहा है ना उसे उन लगभग सौ भारतीयों के सामूहिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, शारीरिक कष्टों का कोई अनुमान हो जो उसे हमारे साथ कार से उतरते हुए देखेंगे एक हाईवे ढाबे पर जहाँ चाई पीने की उसकी तलब की अवज्ञा करना हमारे लिये लगभग एक गुनाह हो जायेगा, एक क्रिस्तानी ढंग का गुनाह गोकि रोसा को क्रिस्तानी कहना क्या कम गुनाह है....


(दिलचस्प है कि यह उन दिनों का किस्सा है जब हिन्दी के शुद्धतावादी पंडित विदेशी नामों के शुद्ध उच्चारण को लेकर किसी पर मुकदमा तक ठोक सकते थे इज्जत उतारना तो आम बात थी गोकि शुद्धतावाद, और पंडितों से भी, उनकी नाराजगी बहुत मशहूर थी इस जनपद में)

पर असल कथा अब शुरू होती है बोरहेस या बोर्खेस या बोर्खे़ज और मारकेस या मारकेज़ या मार्क्वेज़ के बारे में बात करते करते वह प्रोफेसर दे की बात करती है जिनका हाथ काफी देर पकड़े रहे थे बोरहेस या बोर्खेस या बोर्खे़ज, तब तक वे बूढ़े और अंधे हो चले थे, और अचानक बोले प्रोफेसर दे से

(जो रोसा के मुताबिक जेएनयू में कुछ बिग शॉट रहे, स्पहानी के बहुत अच्छे स्कॉलर रहे, शायद जेएनयू के वीसी भी लेकिन जो रोसा के दोस्त हैं क्योंकि बहुत विनम्र हैं जो अपने वह सब कुछ बन जाने का जो रोसा समझती है कि वे हैं कारण सिर्फ इतना मानते हैं कि कभी कभी आदमी लकी होता है क्योंकि एक बार लाईट चली जाकर फिर से अचानक न आ गई होती तो उन्होंने उन्नीस सौ पचास के दशक की उस गर्म दोपहर कभी न पाया होता अचानक पंखे की हवा में फड़फड़ाते काग़ज़ों के बीच स्पहानी स्कालरशिप का वो काग़ज़, अगर उनके अंग्रेजी के गुरू ने उन्हें ना कहा होता कि डॉन क्विग्जोट, जिसे हिन्दी में डॉन कुओते, डॉन किखोते, डॉन क्विग्जोह वगैरह लिखा देखा है पर रोसा जिसे डॉन केशोटे कहती है, उसे पढ़े बिना तुम अंग्रेजी मे पीएचडी क्या खा के लिखोगे.... वैसे रोसा अगर यह कहती कि प्रोफेसर दे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी या नालंदा ‘विश्वविद्यालय’के संस्थापक रहे हैं और उनकी उम्र सत्तर पार नहीं कुछ सैकड़ों वर्ष है तो भी बहुत प्यारा ही लगा होता – जादुई यथार्थवाद के सब आशिकों को इतनी छूट तो मिलनी ही चाहिये)

कि “या तो मैंने यह पढ़ा है या कल्पना कर ली है कि हिमालया शीवा के लाफ्टर से निकला है”, प्रोफेसर दे तब से बहुत ढूँढ चुके पर पुष्टि नहीं हुई कि जो बोरहेस या बोर्खेस या बोर्खेज़ ने कहा वह वाकई कहीं लिखा हुआ है कि नहीं और अब ये मानने लगे हैं भले लिखा न गया, यही तो नहीं हुआ था?
2
जब भी कोई मुझसे कहता है भारत या बनारस के बारें में लिखो मैं उससे कहना चाहती हूँ भारत के बारे में लिखा नहीं जा सकता – मैं स्पेन के बारे में लिख सकती हूँ या प्रोफेसर दे बारे में, कितने भले आदमी हैं हर बार गुड़गाँव से चलकर कनाट प्लेस आते हैं मिलने के लिये इफ यू वांट मी टू, वी कैन मीट हिम बट आई विल हैव टू टैल हिम इन अडवांस यह लिखकर दिखा पाना कितना मुश्किल है कि कोई स्पहानी अंग्रेजी या हिन्दी कैसे बोलती है मेरे दिमाग में यह सब चल रहा है कि वह अपनी कम्बोडिया ट्रिप के बारे में बताने लगती है, हम गंतव्य के पास हैं, यू नो मेरा एक दोस्त है कम्बोडिया में अ बुद्दिस्ट मंक वहाँ मंक कैन से एनी टाईम नाऊ आयम नॉट ए मंक हाँ ट्रस्ट मी दे से टुनाईट आयम नॉट ए मंक...

वह उतरती है टैक्सी के भाड़े का एक तिहाई मुझे देती है – सामने उसका गेस्ट हाऊस है, “माय वीकएंड फैमिली”

हम हाथ हिलाते हैं दीवाली की छुट्टियाँ हैं हम अपनी फोरएवर फैमिलीज़ की तरफ बढ़ते हैं –

हम दोनों के फोन पर रात को एसएमएस आयेगा – Trust Borges, Himalaya came out of Shiva’s laughter*
_________________________________
* वैसे तथ्य यह है कि यह बात (=हिमालय शिव की हँसी से निकला है) कालिदास ने मेघदूतम में लिखी है। (59वाँ पद)

"बहार" बरास्ता अशोक कबाड़ीवाला

रंग-ए-सुखन का एक सुर्ख़ रंग

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