हक़
उन्हें भी था
जो
मारे गए
और हक़
उन्हें भी है जो मारे जायेंगे
ग़रीबॉ के पास
सिर्फ़
हक़ होता है
चीज़ॉ पर
चीज़ें नहीं !
दोस्तों ये भी एक बहुत पुरानी - बहुत छोटी कविता १९९२ के ज़माने की .......
Monday, May 12, 2008
हक़
Friday, May 9, 2008
शोकसभा में
आप सभी को मेरी पुरानी कवितायेँ पसंद आ रही हैं ! इसलिए १९९४ की ये एक और कविता .........
शोकसभा में
यह समय
घनीभूत पीड़ा का है
और झुके हुए सिर
इसकी
गवाही दे रहे हैं
तूफान से पहले की नहीं
तूफान के बाद की शांति है ये
अवसाद के इस क्षण में
शोक मुझको भी है
शोक
उसका नहीं उतना
जो खो गया
शोक उसका
जो खो जायेगा एक दिन
यूं ही सिर झुकाये ...
Thursday, May 8, 2008
किताबें
दोस्तो ये कविता भी 1992 की है और मुझ पर आजकल अपने अतीत को याद करने की धुन सवार है। उसी क्रम में प्रस्तुत इस कविता में उत्साह और ऊर्जा का वह रूमानी दौर भरपूर मौजूद दिखाई देगा। मेरे लिए तो ये एक बार फिर भूले-बिसरे के नजदीक भर जाना है !
किताबें
सदियों से
लिखी और पढ़ी जाती रही हैं
किताबें
किताबों में आदमी का इतिहास होता है
राजा
रियासतें
और हुकूमतें होती हैं किताबों में
जो पन्नों की तरह
पलटी जा सकती हैं
किताबों में होता है
विज्ञान
जो कभी आदमी के पक्ष में होता है तो कभी
टूटता है
कहर बनकर उस पर
कानून होता है किताबों में जो बनाया
और तोड़ा जाता रहा है
किताबों में होती हैं दुनिया भर की बातें
यहां तक कि किताबों के बारे में भी लिखी जाती हैं
किताबें
कुछ किताबें नहीं होतीं हमारे लिए
देवता वास करते हैं
उनमें
पवित्र किताबें होती हैं वे
फरिश्तासिफत इंसानों के पास
हमारी किताबों में तो बढ़ते हुए कदम होते हैं
उठते हुए हाथ होते हैं
हमारी किताबों में
और उन हाथों में होती हैं
किताबें !
Wednesday, May 7, 2008
मैं जीवित हूँ
दोस्तो ये कविता 1992 की है और मुझे इस पर 80 के बाद की पीढ़ी के कविकुलगुरु केदारनाथ सिंह का प्रभाव साफ दिखाई देता है। मैं इस कविता और इस प्रभाव को अपना अतीत मानता हूं और अतीत की ये खुरचन आपके आगे रख रहा हूं। अपनी बेबाक टिप्पणी तो देंगे न ?
मैं जीवित हूं
मैं जीवित हूं
और ये जरूरी खबर किसी अखबार में नहीं
मेरे चेहरे पर छपी है
मैं जीवित हूं
और लगा आया हूं सुबह-सुबह
बाजार का एक चक्कर
मैं भांप आया हूं मौसम और लोगों का मिजाज -
फिलहाल लोगों को काम पर जाने की जल्दी है और मौसम
उनके साथ है
मैं देख आया हूं
कि शहर के सबसे बड़े मंदिर में चल रहा है
अखंड यज्ञ
कि मस्जिद की सबसे ऊंची मीनार से आ रही है
अजान की आवाज
कि शुरू हो चुकी है गुरुद्वारे में
अरदास
देख आया हूं मैं
कि सभी दुकानों में जारी है खरीदफरोख्त
सभी तरह की
नाप आया हूं सड़कें
और हालांकि पुलिस थाना अभी तक सो रहा है
लेकिन शहर में शांति है
जो चीख-चीखकर अपने होने का पता दे रही है
मेरे शहर के लोगो !
मैं जीवित हूं और आज की तारीख में यह सचमुच एक ऐसी बात है
जिसे मैं किसी भी दूसरे आदमी से कह सकता हूं
पूरे यकीन के साथ !
Monday, May 5, 2008
पहाड़
दोस्तो ये दो कविताएं 1991 की हैं और इनका कच्चापन साफ दिखाई देता है- आप इन्हें मेरी निजी और पुरानी डायरी के दो पीले पन्ने समझ सकते हैं। पर पुराने दिनों और पुरानी उम्र को भी याद करना कभी-कभी अच्छा लगता है ! है, ना ?
एक
मैंने कभी नहीं नापी
उसकी ऊंचाई
कभी नहीं किया
आश्चर्य
उसके इतना ऊंचा होने पर
मैं तो सिर्फ उसके ऊपर चढ़ा और उतरा
उतरा और चढ़ा
और इसके सबके बाद
मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं
कि मैं
अब पहाड़ पर रह सकता हूं !
दो
मुझे याद आया
पहाड़ की धार पर बसा वो गांव
जहां
अब मैं नहीं रहता
फिर मुझे याद आए
मौसम के सबसे चमकीले दिन
और ढलानों पर फलते जंगली फलों का उल्लास
जिनका स्वाद
अब भी मेरी जीभ पर है
बिल्कुल मेरी भाषा की तरह
फिर मुझे याद आए लोग
जो कई दिनों से मेरी नींद के आसपास थे
और जिन्हें वक्त रहते पहुंचना था
अपने-अपने घर
फिर मुझे
फिर-फिर याद आया
अपना पहाड़
और मैंने पाया कि वो तो रखा हुआ है
पूरा का पूरा
मेरे दिल पर !
Sunday, May 4, 2008
रघुवीर सहाय
उम्र
जब तुम बच्ची थीं
तो
मैं तुम्हें रोते हुए नहीं देख सकता था
अब तुम रोती हो
तो
देखता हूँ मैं !
एक सार्थक कविता अपने पाठक के लिए कितना स्पेस छोड़ती है , इसकी एक बानगी उस्ताद कवि रघुवीर सहाय की इस कविता में देखी जा सकती है !
राजकमल से प्रकाशित ' लोग भूल गए हैं ' से साभार !
Saturday, May 3, 2008
एक अविवाहिता का अविस्मरण
एक अविवाहिता का अविस्मरण
जहाँ पशु-पक्षियों में भी जोड़ा बनाने का विधान हो
हमारी उस नर-मादा दुनिया में
उसने सिर्फ़ मनुष्य बनने और अकेले रहने का
विकट फैसला लिया
अपने चुने हुए एकान्त में
अपने बुने हुए सन्नाटे में
उसने चाहा कि कोई उसे तंग न करे
और यह एक ऐसी कार्रवाई थी
जिसे उसके अपने घेरे के बाहर लोगों ने
विवाह विरोधी
परिवार विरोधी
समाज विरोधी
और अंत में चल कर
स्वैराचार करार दिया
अब उसकी उम्र के पाँचवे दशक में
उसका वह एकान्त
अचानक ही घुस पड़ा है
कई-कई विस्फोटों से भरे
मेरे जीवन में
उसका वह ज़बरदस्त सन्नाटा भी
गूंजता है
मुझसे जुड़े दूसरे रिश्तों के आत्मीय कोलाहल के बीच
उसे पता नहीं
या फिर शायद जानबूझ कर वह चली आई है
एक ऐसी खतरनाक जगह पर
जो ख़ुद मुझे पाँव देने को तैयार नहीं
और जिसका
कोई स्मरण
कभी
बाक़ी न रहेगा
मालूम होना चाहिए
उसे
कि मुझ जैसा कायर कवि नहीं
उसके इस तरह
अविस्मरणीय होने की कथा तो
उस जैसा
कोई मनुष्य ही कहेगा !
